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VOL. 6, ISSUE 1 (2024)
बदलते नगरीय भूमि उपयोग का पर्यावरण पर प्रभाव
Authors
आसुराम डऊकिया
Abstract
नगरीय भूिम उपयोग का आशय नगर सीमा में स्थित धरातलयी क्षेत्र के उपयोग से है। नगर में धरातलीय क्षेत्र को निर्मित कर उसका उपयोग किया जाता है। नगरों की कार्यात्मक आकारिकी या नगरीय आकारिकी के कार्यात्मक पक्ष या नगरीय भूिम उपयोग शीर्षक के अन्तर्गत नगर के विभिन्न भागों में विभिन्न कार्यों में भूिम का जो उपयोग किया जा रहा है, का अध्ययन समाहित हैं। जब एक विशेष कार्य के लिए किसी क्षेत्र के सर्वाधिक भवनों का प्रयोग किया जाता है तो उस क्षेत्र को उस कार्य के आधार पर नामांकित किया जाता है, जैसे- आवासीय क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र, शैक्षणिक क्षेत्र और सांस्कृतिक क्षेत्र आदि। अतः स्पष्ट है कि भूिम उपयोग नगरीय कार्यात्मक आकारिकी की पहचान का आधार बन जाता है। नगरीय भूिम उपयोग में समय के साथ परिवर्तन होते रहते है। समय के साथ मांग में परिवर्तन एक स्वाभाविक प्र्रक्रिया है। नगर संगठन में नगर अभ्युदय के साथ केन्द्रोपसारी शक्तियां सभी वस्तुओं को बाहर की ओर उन्मुख करने लगती है। उदाहरण के लिए नगर का सम्पन्न वर्ग पहले केन्द्र के पास बसता है। लेिकन बढ़ती भीड़-भीड़ के कारण बाद में ऐसा वर्ग नगर के बाहर बसने में सुख-सुविधाओं का अनुभव करता हैं। समय के संदर्भ में जनसंख्या का विकास हुआ एवं मानव की आवश्यकताएं निरन्तर बढ़ती गयी, परिणामतः पर्यावरण का रूपान्तरण होता गया। पर्यावरण के रूपान्तरण के साथ-साथ प्रदष्ूाण का समावेश होता गया। 21वीं शताब्दी तक नव तकनीकी के विकास के कारण भूिम उपयोग प्रारूप में आधुनिकीकरण तथा औद्योगिकीकरण का भृदृष्य परिलक्षित हुआ। इसके द्वारा जहां मानव का कल्याण हुआ, वहीं पर पर्यावरण की विकट समस्या भी उत्पन्न हो गयी है। जनसख्ंया की विस्फोट स्थिति, नगरीकरण, औद्योगिकीकरण, वैज्ञानिक-कृषिकरण आदि के कारण भूिम उपयोग प्रारूप मंे परिवर्तन से अनेक प्रकार के प्रदूषणों का उद्भव हुआ है।
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Pages:68-72
How to cite this article:
आसुराम डऊकिया "बदलते नगरीय भूमि उपयोग का पर्यावरण पर प्रभाव". International Journal of Social Research and Development, Vol 6, Issue 1, 2024, Pages 68-72
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