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VOL. 8, ISSUE 2 (2026)
पारिवारिक भूमिकाएं एवं उसका बदलता स्वरूप गरियाबंद जिले के संदर्भ में एक अध्ययन
Authors
राजेश कुमार बघेल
Abstract
भारत जैसे देश में परिवार एक आधारभूत सामाजिक संस्था के रूप में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, यह व्यक्ति के संपूर्ण जीवन तक उसके संस्कृति, नैतिक व सामाजिक विकास को एक दिशा प्रदान करता है। परिवार न केवल समाजीकरण का मध्यम है, ब्लकि यह हमारी संस्कृति व परंपरा के संरक्षण, सामाजिक नियंत्रण तथा व्यक्तियों को भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करने का भी प्रमुख आधार रहा है। यदि हम छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखें तो यहां के ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों में परिवार की भूमिका बहुत ही प्रभावशाली और अधिक व्यापक रही है। गरियाबंद जिले में पारंपरिक रूप से संयुक्त परिवार प्रणाली का प्रचलन रहा है, जिसमें प्रत्येक सदस्यों की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से निर्धारित होती थी और परिवार के सदस्यों के बीच सहयोग व परस्पर निर्भरता की भावना मुख्य रूप से देखने को मिलती थी। परंतु वर्तमान में वैश्वीकरण के प्रभाव, औद्योगिकरण, नगरीकरण, संचार एवं यातायात का विकास तथा शिक्षा के प्रसार जैसे कारकों की वजह से पारिवारिक संरचना एवं भूमिकाओं में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं। अब संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवारों की संख्या लगातार बढ़ रही है। महिलाओं में शिक्षा का प्रसार होने से सामाजिक एवं आर्थिक भूमिका में विस्तार हुआ है, तथा युवाओं में स्वतंत्रता बढ़ी है और स्वयं निर्णय लेने की प्रवृत्ति विकसित हुई है। इसके साथ ही साथ पारंपरिक मूल्यों में परिवर्तन, पीढ़ीगत अंतराल तथा परिवार के बुजुर्गों की भूमिका में कमी जैसी प्रवृत्तियां हमें दिखाई दे रही है। गरियाबंद जिले में परिवारों के बीच हमें परंपरा और आधुनिकता के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिसके कारण गरियाबंद जिले के संदर्भ में इन परिवर्तनों का अध्ययन विशेष महत्व रखता है। अतः प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य परिवार की भूमिकाओं के पारंपरिक स्वरूप का विश्लेषण करते हुए वर्तमान में बदलते आयाम का अध्ययन करना, और इन परिवर्तनों के कारण होने वाले विभिन्न प्रभावों को समझना है, ताकि वर्तमान समाज में परिवार की बदलती हुई प्रकृति का समग्र विश्लेषण किया जा सके।
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Pages:39-41
How to cite this article:
राजेश कुमार बघेल "पारिवारिक भूमिकाएं एवं उसका बदलता स्वरूप गरियाबंद जिले के संदर्भ में एक अध्ययन". International Journal of Social Research and Development, Vol 8, Issue 2, 2026, Pages 39-41
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