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International Journal of
Social Research and Development
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VOL. 8, ISSUE 1 (2026)
भारत में पंचायती राज की उपयोगिता और चुनौतियाँः एक विश्लेषण
Authors
मधुलिका कुमारी
Abstract
पंचायती राज व्यवस्था में निहित मूल धारणा गांवों में निचले स्तर पर विकास से जुड़ी योजनाओं को मूर्त रूप देकर ग्रामीण लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रोत्साहित करना तथा अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए जिला प्रशासन, राज्य तथा केन्द्र सरकार का मुंह ताकने की प्रवृत्ति से छुटकारा दिलाना है, तथा निचले स्तर पर जनता का प्रत्यक्ष रूप से सहयोग प्राप्त करना एवं शासन व्यवस्था में उनकी भागीदारी को सुनिश्चित करना है। स्वतंत्र भारत के संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया। इसके साथ ही संविधान की सातवीं अनुसूची (राज्य सूची) की प्रविष्टि 5 में ग्राम पंचायतों को शामिल करके इस संबंध में कानून बनाने का अधिकार राज्यों को दिया गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गांधीजी के सिद्धांत के अनुकूल पंचायती राज व्यवस्था पर विशेष बल दिया गया और इसके लिए केन्द्र में पंचायती राज एवं सामुदायिक विकास मंत्रालय की स्थापना की गई।
पंचायती राज ने ग्रामीण सामाजिक संरचना में परिवर्तन में सहयोग प्रदान किया है। अब लोग विकास कार्यों में भाग लेने व विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में संबन्धित असफलताओं को उजागर करने तथा आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने लगे हैं। पंचायती राज संस्थाओं ने ग्रामीणों में उत्तरदायित्व की भावना जाग्रत करने में योग दिया है। सरकार द्वारा बनाए गए विकास एवं निवारण कार्यक्रमों को स्थानीय स्तर पर लागू करने तथा उससे अपेक्षित परिणाम दिखाने में पंचायती राज संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित कल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यक्रमों को चलाने की जिम्मेदारी जिला पंचायत, जनपद पंचायत और निचले स्तर पर ग्राम पंचायत की है। ग्राम पंचायतों को चाहिए कि वे कानून से मिले अधिकारों के अन्तर्गत अपने कार्यक्षेत्र के गांवों के विकास तथा ग्रामीणों की भलाई के लिए इन सभी योजनाओं और कार्यक्रमों को अच्छी तरह से संचालित करें।

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Pages:42-48
How to cite this article:
मधुलिका कुमारी "भारत में पंचायती राज की उपयोगिता और चुनौतियाँः एक विश्लेषण". International Journal of Social Research and Development, Vol 8, Issue 1, 2026, Pages 42-48
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